......कुछ दिन पहले
मुर्गा और मुर्गी दम्पति
दिया था जो बच्चा
हुआ जवान आज सच्चा
दुसरे की सगाई देख
मुर्गा दम्पति को भी हुई बेटे के विवाह की चाह
सोचा बेचारा का दो दिन की ही तो जवानी है
बेटे की विवाह करनी न अब बचकानी है
दो दिनों की जिन्दगी में
काटू समय अगर चैन आनंद की
क्यों न सजाऊं बरात
अपने बेटे की
दुल्हा बनेगा मुर्गाराज हमारा
समधी बनूँगा मैं भी किसी मुर्गे का
बैण्ड बजाये जायेंगे
नर्तक नचाये जायेंगे
शादी की तिथि तय हुई
बरात सजने लगी
कुकरू-कु करने लगे सब।
- उत्तम सिंह
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