न बचा धान,
न बचेगी ज़ान।
न रहेगी कोयले की शान।।
अब कैसे रहे आबाद?
कोयले के दोहन से
क्या हो जाएंगे बर्बाद?
आग ,धुआं , धंसान का जहां,
लोग पूछ रहे
आख़िर हम जाए कहां?
सर्वत्र गरजती मशीनें,
धूल-गर्द।
सता रहा हर पल
विस्थापन का दर्द।।
कोख में काला सोना,
फिर भी नियति रोना।
कोयला बन गया अभिशाप,
इसे सहेजना बन गया पाप।
बिना छूकर इसे
कोई बन गया मालामाल,
कोयले का किसान
आज भी है कंगाल।
लोग रहे हैं चीख,
नहीं मांगेंगे भीख।
सब होंगे साथ,
हाथों में होगा हाथ।
अब
ख़त्म होगी
स्याह अंधेरी रात।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X