बहती रहे ममत्व की धारा
वात्सल्य का गुण गाते रहे जग सारा.
ख़ुशी से झूम उठे ज़मीन आसमान
सर्वत्र हो वात्सल्य ममता का जयगान.
कदम चले प्रगति की राह
मिट जाए कष्ट , क्लेश , आह.
मिटे अंधकार, स्याह अंधेरी शाम
ममता की छांव में दिखे चारो धाम .
जीवन संध्या का न हो स्पर्श
छूते रहे वह प्रगति का उत्कर्ष .
मीरा का भजन हो; हो मदन मोहन का तान
धरती वृंदावन लगे , गूंजे प्रेम का गान.
साथ रहे प्रीत , गुनगुनाए गीत .
शाम (संध्या) को दीप जले , रौशनी तले
हो उमंग, उत्सव , उल्लास
उम्मीद जगे, संचारित हो नयी आस.
ख़त्म हो जुल्म , अट्टहास, त्रास.
उमड़े वात्सल्य , ममता की धारा
ख़ुशी से झूम उठे जग सारा.
-उत्तम मुखर्जी
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