शहर के विवेक में एक अदृश्य सूची टँगी रहती है—
किसका विलाप इतिहास के कानों तक पहुँचेगा,
किस मृत्यु की स्मृति में मोमबत्तियाँ जलेंगी
और किस पीड़ा को सभ्यता के पुराने शब्दकोश में
एक निषिद्ध शब्द की तरह दफ़्न कर दिया जाएगा।
किसी के रक्त से मनुष्यता का अर्थ उज्ज्वल हो उठता है,
किसी दूसरे के रक्त पर कानून अपनी भाषा में लोहे की धार चढ़ा लेता है;
अपराध अपनी जगह अपरिवर्तित रहता है—
बदलते हैं केवल चेहरे, और उनके पीछे खड़ी सामाजिक हैसियत की अदृश्य दीवारें।
धर्म की प्राचीरें कभी-कभी प्रार्थना की देह पर भी सीमाओं की लिपि अंकित कर देती हैं;
मनुष्य को मनुष्य की तरह पहचानने से पहले हम उसके नाम, जाति और आस्था का एक अदृश्य परिचय-पत्र माँगते हैं—
फिर तय करते हैं किस आँख का जल पवित्र कहलाएगा और किस कंठ की चीख अपवित्र।
हम न्याय की प्रतिमा को आँखों पर पट्टी बाँधे हुए देखते हैं,
पर उसके हाथों में थमे तराजू के दोनों पलड़ों पर कभी-कभी हमारी ही उँगलियों के निशान चमकते हैं;
एक पलड़े में अपराध, दूसरे में पहचान—
और निर्णय के उच्चरित होने से बहुत पहले वज़न तय हो चुका होता है।
यह मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे उठता हुआ एक मौन स्थापत्य है—
जिसमें करुणा के द्वार तो हैं, पर हर देह के लिए नहीं;
क्षमा की ओर जाती सीढ़ियाँ तो हैं,
पर प्रकाश केवल उन कमरों तक पहुँचता है जिन्हें समाज ने पहले ही अपना घोषित कर रखा है।
इसीलिए हम कई बार अपराध से नहीं, अपराधी की पहचान से घृणा करना सीखते हैं;
और पीड़ित की पीड़ा भी उसके नाम की छाया में रखकर तौली जाती है।
मानवता के इस गुप्त गणित में मनुष्य धीरे-धीरे शून्य में बदल जाता है—
बचती हैं केवल पहचानें, और उनकी गणना करती हुई एक निर्मम व्यवस्था।
कभी न कभी हमारे सभी धर्मग्रंथ, कानून की समस्त धाराएँ और नैतिकता के सारे ऊँचे उच्चारण एक ही प्रश्न के सामने निरुत्तर खड़े होंगे—
यदि सहानुभूति भी चयन करने का अधिकार माँगने लगे,
तो मनुष्य के भीतर बचा हुआ मनुष्य कहाँ जाएगा?
तब शायद कोई उत्तर नहीं होगा;
केवल एक दर्पण होगा—
जिसमें अपराधी और पीड़ित, धर्म और समाज, न्याय और
अन्याय के बीच खड़ा हमारा अपना चेहरा
पहली बार स्वयं को अजनबी की तरह देखेगा।
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