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आँखे मौत के बाद अपनी की बेवफ़ाई देखतीं हैं ।

                
                                                         
                            कहते हैं, मरने के बाद भी कुछ देर तक आँखों में हलचल रह सकती है,
                                                                 
                            
पर कौन जाने, उन आँखों ने आख़िरी बार क्या देखा होगा…

जब वही आँखें अपनों को रोते हुए देखती होंगी,
अपने ही घर में खुद को बेगाना होते देखती होंगी,
रिश्तों को टूटते और अपनों को बदलते देखती होंगी,
तो शायद ख़ामोशी से यही कहती होंगी—

*“ज़िंदगी से तो मौत ही बेहतर थी,
कम-से-कम वहाँ सुकून तो होगा…
न कोई दर्द होगा, न कोई शिकायत,
न अपनों से कोई उम्मीद होगी…”।

जिन आँखों ने सारी उम्र अपनों के लिए सपने सजाए,
अगर उन्हीं आँखों को अपनों के बदलते चेहरे देखने पड़ें,
तो मौत का अँधेरा भी शायद सुकून-सा लगे।

कभी-कभी मौत से डर नहीं लगता,
डर तो उस ज़िंदगी से लगता है,
जहाँ इंसान साँसें तो लेता है,
मगर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है!
-ऊषा शुक्ला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
50 मिनट पहले

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