ज़रा शाम ढले आ जाना
ज़रा शाम ढले आ जाना,
कुछ पल मेरे संग बिताना।
कुछ किस्से तुम कहना मुझसे,
कुछ मैं मन की सुनाऊँगी;
चाय की हल्की-सी गर्माहट में,
यादों को फिर महकाऊँगी।
साँझ की धीमी रोशनी में,
मन के दीप जलाएँगे;
बीते लम्हों की खुशबू लेकर,
कुछ सपने फिर सजाएँगे।
खामोशी भी गीत बनेगी,
जब तुम मेरे पास आओगे;
सूनी-सी इन शामों में,
रंग नए भर जाओगे।
तुम बस हल्का-सा मुस्कुरा देना,
मैं मौसम-सी खिल जाऊँगी;
तेरी एक मधुर मुस्कान पर,
हर शिकवा भूल जाऊँगी।
तेरी बातों की नरमी से,
मन का दर्द बहल जाएगा;
सूना-सूना यह मन मेरा,
फिर से जैसे गा जाएगा।
बातों-बातों में यूँ ही शायद,
वक़्त कहीं ठहर जाएगा;
एक सुहानी-सी शाम का पल,
जीवन भर याद आएगा।
कुछ पल तुम मेरे हो जाना,
कुछ पल मैं तुम्हारी हो जाऊँ;
इन छोटी-छोटी खुशियों में,
जीवन की धुन फिर गुनगुनाऊँ।
फिर जब लौटो अपनी राहों पर,
एक वादा साथ ले जाना—
जब भी मन थोड़ा उदास हो,
ज़रा शाम ढले आ जाना।
कभी चाय की प्याली होगी,
कभी यादों का सिलसिला;
तुम आओगे तो इस आँगन में,
खिल उठेगा हर एक गिला।
शाम ढले बस इतना करना—
दरवाज़े पर दस्तक देना;
बाकी बातें आँखें कह देंगी,
तुम बस अपना साथ ले आना।
ना कोई शिकवा, ना कोई सवाल,
बस कुछ पल मेरे बन जाना—
जब भी मन को मेरी याद आए,
ज़रा शाम ढले आ जाना।
-नीरजा वकील
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