ज़माना ऑनलाइन है
सुबह आँख जब खुलती है,
फ़ोन हमें जगाता है।
घर में कोई बात करे तो,
“मैसेज कर”—बतलाता है।
रिश्ते सारे ग्रुप में हैं,
मिलना अब बेकार हुआ।
जन्मदिन पर ‘GIF’ भेज दी,
समझो पूरा प्यार हुआ।
खाना ठंडा होता जाए,
फ़ोटो गरम दिखाई है।
भूखे बैठे चार जनों ने,
पोस्ट पे वाहवाही पाई है।
चेहरे फ़िल्टर से चमके हैं,
मन का दाग़ पुराना है।
तस्वीरों में जन्नत दिखती,
घर में रोज़ फ़साना है।
पढ़ी न पुस्तक एक मगर,
ज्ञान बहुत बरसाते हैं।
दो रीलों से जग को समझे,
गुरु बनकर समझाते हैं।
सच बेचारा पैदल चलता,
झूठ जहाज़ से आता है।
जाँच अभी पूरी भी न हो,
फ़ैसला वायरल हो जाता है।
दान किए दो कंबल लेकिन,
दस कैमरे बुलवाए हैं।
ठिठुर रहे इंसान से पहले,
अपने चेहरे दिखलाए हैं।
सेहत की चिंता भारी है,
फ़िटनेस ऐप मँगाया है।
कदम गिने हैं दस हज़ार,
मोबाइल कुत्ता घुमाया है।
कर्ज़ की किस्तें रोती हैं,
ब्रांड अमीरी दिखलाते हैं।
‘सेल’ में जो ज़रूरत न थी,
वही ख़रीदकर लाते हैं।
काम पड़ा है मेज़ के नीचे,
मीटिंग ऊपर जारी है।
जिसने काम किया चुपके से,
उसकी ‘क्रेडिट’ सरकारी है।
घर में चारों साथ मगर,
सबका कमरा अलग हुआ।
वाई-फ़ाई जब बंद हुआ तो,
परिवार से परिचय हुआ।
बच्चा बोला—“पापा सुनिए,”
पापा फ़ोन चलाते हैं।
फिर ‘फैमिली वैल्यूज़’ पर वे,
लंबा लेख लिख जाते हैं।
तरक़्क़ी ने सब कुछ दे डाला,
बस थोड़ा एहसास गया।
दुनिया मुट्ठी में आ बैठी,
हाथों से अपना हाथ गया।
सबसे जुड़ने की चाहत में,
ख़ुद से रिश्ता टूट गया।
ज़माना ऑनलाइन होते-होते,
इंसान कहीं पर छूट गया।
— संतोष कुमार शर्मा
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