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वृद्ध आश्रम में माता-पिता क्यों हैं।

                
                                                         
                            वृद्ध आश्रम में माता-पिता क्यों हैं?
                                                                 
                            
कैसा यह दौर है,
कैसी यह बदलती चाल है;
युवाओं के मन में
कैसा यह नया ख्याल है?
जिन हाथों ने
थामी थी उँगली हमारी,
आज वही माँ-बाप
क्यों हो गए लाचार?
आलीशान गाड़ियों में
पालतू सैर करते हैं,
और माता-पिता
वृद्ध आश्रमों में
अपनों की राह तकते हैं।
सुविधाओं के अंबार हैं
घर-आँगन के बीच,
फिर भी अपने ही
क्यों हो जाते हैं अजनबी?
वृद्ध आश्रम के
एक शांत कोने में
बैठी थी एक माँ।
चेहरे पर झुर्रियों का इतिहास था,
पर आँखों में अब भी
बेटे के लौट आने का विश्वास था।
एक दिन बेटा आया—
औपचारिक मुस्कान लिए;
मानो ममता का ऋण चुकाने नहीं,
सिर्फ़ एक औपचारिकता
निभाने आया हो।
धीरे से बोला—
“माँ, तुम्हारे लिए
मैं क्या कर सकता हूँ?”
माँ ने काँपती आवाज़ में कहा—
“बेटा,
यहाँ कुछ पंखे
लगवा देना।”
बेटा चौंक गया।
बोला—
“माँ, अब तो
कुछ ही दिन शेष हैं,
फिर इसकी क्या आवश्यकता?”
माँ मुस्कुराई।
आँखों में नमी थी,
पर शब्दों में
जीवन का सबसे बड़ा सत्य—
“बेटा,
मैंने तो बिना पंखे के भी
सारी उम्र काट ली।
पर जिस दिन
तेरी संतान
तुझे यहाँ छोड़ जाएगी,
उस दिन शायद
बिना पंखे के
तुझे नींद न आए।”
इतना सुनते ही
बेटे की आँखें झुक गईं।
अहंकार का आवरण टूट गया,
और अंतरात्मा
मौन होकर रो पड़ी।
याद रखो—
माता-पिता बोझ नहीं,
जीवन का
सबसे बड़ा आशीर्वाद हैं।
जो उनका सम्मान करते हैं,
उनके घरों में
संस्कारों की सुगंध
पीढ़ियों तक महकती है।
कर्म का चक्र अटल है—
आज जो अपने माता-पिता को दोगे,
कल वही
तुम्हारी संतान
तुम्हें लौटाएगी।
आओ, ऐसा समाज बनाएँ
जहाँ वृद्ध आश्रमों की आवश्यकता
दिन-प्रतिदिन कम होती जाए;
जहाँ हर घर में
माता-पिता का सम्मान हो,
प्रेम का दीप जले,
और किसी माँ की आँखें
अपने ही बच्चों की राह
न ताकें।
जहाँ बुज़ुर्गों के चेहरे की
हर झुर्री में
सम्मान की चमक हो,
और उनके जीवन की संध्या
अपनों के स्नेह से
रोशन हो।
- नीरजा वकील नीर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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