तुम बनारस के शाम सी
मैं सुबह का भटका मुसाफिर सा,
तुम बिस्मिल्ला कि शहनाई सी
मै उस धुन मे खोया कायल सा,
तुम शिव कि ओझल नगरी सी
मै उस नगरी का एक साकिन सा,
तुम गंगा कि स्तुती सी
मै उस भीड़ मे खड़ा उपासक सा,
क्यु लिखूँ मै एक मुसाफिर
तुम अनंत आध्यात्म सी
मै तुझमे समाया शुन्य सा l
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