अंधेरों की चादर को चीरकर,
नया सवेरा आज फिर आया है।
बुझने लगी थीं जो उम्मीदें दिल में,
उनमें हौसलों का दीप जलाया है।
हर मुश्किल एक इम्तिहान है यहाँ,
रुकना नहीं, बस आगे बढ़ते जाना है।
मंजिल चाहे कितनी भी दूर हो दोस्तों,
अपनी मेहनत से उसे अपना बनाना है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X