मैं मंजिल खरीदूं, सफर बेच दूं चलो आज अपना हुनर बेच दूं।
जो लिखने लगा हूं जज्बात कागज पर, तुम चाहते हो मैं कलम बेच दूं।
जो बचपन का सही भाव दे दे, चंद लम्हों के खातिर उम्र बेच दूं।
आजाऊं मैं हराम की कमाने पर, दवाएं दिखाकर जहर बेच दूं।
-आशीष सिंह
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