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सोने का पिंजरा

                
                                                         
                            देख सोने का पिंजरा , इठलाई में ,मुस्कुराई में ,बलखाई में,
                                                                 
                            
ना घबराई ,ना सोचा कि कल को उड़ना चाहा तो ,कैसे उड़ूंगी ,कहां से उड़ूंगी?
ना मिलेगी जगह ,ना होगा कोई रास्ता निकालने का।
इस सोने के पिंजरे में सिर्फ एक झरोखा था,
बाहर के सपनों को खुली आँखों से सिर्फ देखने का।
थी पजगह की किल्लत ,पर उन सपनों को पूरा करने की सोचती रही,
की मिला है या सोने का पिंजरा सिर्फ देख सकूं मैं नजारे।
उन नजरों का लुफ्त, उठाने ना देगा कोई अपना,
कैसे वह अपने होते हैं जो अपनी ही चिड़िया के लिए सोने का पिंजरा सजोते हैं,
देख सोने का पिंजरा वह खुश होते हैं,
जब तक सोने का पिंजरा नहीं मिलता,
वह घर लौटने की कोशिश भी नहीं करते।
सोचते ,भी नहीं पिंजरा लोहे का हो ,या सोने का है तो वह सिर्फ एक पिंजरा ही।
कैसे खुद की चिड़िया के लिए ढूंढ लाते हैं वह सोने का पिंजरा,
ना हो कष्ट उसे चिड़िया को यह सोचकर वह खोजते हैं वह सोने का पिंजरा,
पर उस सोने के पिंजरे में , ना पूछते उससे कि क्या रहना है तुझे इसमें?
बस खुद की तसल्ली के लिए छोड़ आते हैं ,
उसे उस सोने की पिंजरे में लेकिन है तो वह एक पिंजरा........
-रश्मि
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एक घंटा पहले

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