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अब ना किसी का सिंदूर हूं मैं

                
                                                         
                            आदि हूं मैं,
                                                                 
                            
अनादि हु मैं,
शमशान का स्वादी हूं मैं,

ना वीर हूँ,
ना प्रिया हूं मैं,
अब ना किसी का सिंदूर हूं मैं,

ना आज हु,
ना काल हु,
बस में केवल एक याद हूं,
भले तुम्हारे पास हूं,
फिर भी शमशान का अब मैं लाश हूं,

ना नाम हु,
न जात हु,
ना मैं कोई बात हूं,
बस वक्त के मैं साथ हूं,
क्योंकि मैं केवल लाश हूं,

ना पुत्र हूं,
ना शत्रु हूं,
ना किसी का मित्र हूं,
बस संसार की मैं याद हूं,
क्योंकि शमशान का अब मैं लाश हूं,

न आश हु,
ना निराश हु,
केवल में एक श्वास हूं,
अब सबके लिए मैं खास हूं,
क्योंकि मैं केवल एक लाश हूं,

शुरू होगी नई कहानी,
मैं यह सोचा करता हूं,
लकड़ी की बानी सैया पर
अब मैं सोया करता हूं,
राखो से बने चद्दर को
अब मैं ओढ़अा करता हूं,
शमशान का अब मैं लाश हूं,
इसलिए सारी बातें करता हूं।। 
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3 घंटे पहले

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