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अर्थ कमाऊँ इस धरती पर

                
                                                         
                            सब कुछ है… बस अपना-सा नहीं
                                                                 
                            

ऊँची इमारत, शीशे के कमरे,
खिड़की से शहर चमकता है।
सड़कें जागें रात-रात भर,
हर चेहरा आगे बढ़ता है॥

सुविधाओं की कमी नहीं है,
हर सपना आकार यहीं।
सब कुछ है इस पार मगर,
बस अपना-सा संसार नहीं॥

समय यहाँ घड़ी में चलता,
हर पल का हिसाब रखा है।
काम, सफलता, नई उड़ानें,
कल का हर ख़्वाब सजा है॥

कर्म यहाँ पहचान बनाता,
अर्थ यहाँ आधार सही।
सब कुछ है इस पार मगर,
बस अपना-सा संसार नहीं॥

खिड़की पर जब धूप उतरती,
एक पुराना गाँव दिखाए।
पीली सरसों खेतों में फिर,
मन को अपने पास बुलाए॥

मिट्टी की वह सोंधी खुशबू,
किस बाज़ार में मिलती कहीं।
सब कुछ है इस पार मगर,
बस अपना-सा संसार नहीं॥

चाय यहाँ भी गर्म बहुत है,
प्याला वैसा, स्वाद नया।
पर चौपाल की हँसी कहाँ है,
कहाँ वो अपना संवाद नया॥

चाय वहाँ बस चाय कहाँ थी,
साथ बैठने की थी घड़ी।
सब कुछ है इस पार मगर,
वह अपनापन मिलता नहीं॥

फोन बजा तो घर मिल जाता,
चेहरे भी दिख जाते हैं।
माँ की हँसी, अपनों की बातें,
कमरे तक आ जाते हैं॥

स्क्रीन सभी को पास तो लाए,
कंधे का पर स्पर्श नहीं।
सब कुछ है इस पार मगर,
बस अपना-सा संसार नहीं॥

भीड़ यहाँ भी कम तो नहीं है,
चेहरे रोज़ हज़ार मिलें।
‘हैलो’ कहकर लोग गुजरते,
अपने-अपने द्वार मिलें॥

तन्हाई का अर्थ यही है—
कोई दूर नहीं, पास नहीं।
सब कुछ है इस पार मगर,
बस अपना-सा संसार नहीं॥

फिर भी इस धरती ने मुझको,
सपनों को विस्तार दिया।
मेहनत को सम्मान मिला और,
उड़ने को आकाश दिया॥

इस मिट्टी का ऋण भी मुझ पर,
यह कोई परदेश नहीं।
कर्म यहाँ कुछ पास खड़ा है,
दिल की जड़ परदेश नहीं॥

अब समझा मैं देश बदलना,
सिर्फ़ पता बदलना नहीं।
कुछ पाने को दूर निकलना,
अपनों से फिर कटना नहीं॥

जड़ अपनी मिट्टी में रखकर,
शाखाएँ फैलें जहाँ कहीं।
कर्म रहे उस पार भले ही,
दिल की सरहद होती नहीं॥

अर्थ कमाऊँ इस धरती पर,
कर्म से अपनी राह बनाऊँ।
जिसने मुझको पंख दिए हैं,
उस दुनिया का ऋण चुकाऊँ॥

पर जब मन को चैन चाहिए,
सरसों के वे खेत दिखें।
मिट्टी की वह सोंधी खुशबू,
और पुराने मीत दिखें॥

वहाँ कर्म और अर्थ के रिश्ते,
यहाँ दिलों की बात रही।
दुनिया चाहे जहाँ बसा दे—
अपनी मिट्टी साथ रही॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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2 घंटे पहले

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