रुकना अभी मंज़ूर नहीं
राह कठिन है, दूर है मंज़िल,
फिर भी दिल मजबूर नहीं।
गिरकर उठना सीख लिया है—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
कल जो पीछे छूट गया है,
उसका अब अफ़सोस नहीं।
आज खड़ा है बाँह पसारे,
कल की मुझको सोच नहीं॥
जो बीता, उसको जाने दो,
उससे कोई शिकवा नहीं।
साँसों में जब आस बची है—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
ठोकर ने हर बार गिराकर,
चलने का अंदाज़ दिया।
दर्द ने दिल को तोड़ा लेकिन,
जीने का भी राज़ दिया॥
काँटों से अब कैसा शिकवा,
राहों का कुछ दोष नहीं।
पाँव अभी जब चल सकते हैं—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
आँधी से जब दीप लड़ा तो,
भोर ने फिर आकाश चुना।
रात बहुत गहरी थी लेकिन,
सूरज ने फिर रास्ता बुना॥
वक़्त बदलता रहता हरदम,
दुःख का स्थायी दौर नहीं।
आज अँधेरा घना भले हो—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
कुछ अपने भी पीछे छूटे,
कुछ सपने भी टूट गए।
जिन हाथों पर नाज़ बहुत था,
वो हाथों से छूट गए॥
तन्हा चलना पड़े तो चलना,
तन्हाई भी हार नहीं।
ख़ुद का हाथ अभी है थामा—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
एक दरवाज़ा बंद हुआ तो,
क्यों सारा घर छोड़ दिया?
एक राह ने साथ न पाया,
क्यों चलना ही छोड़ दिया?॥
खिड़की से भी राह मिलेगी,
हर रस्ता बेनूर नहीं।
एक दिशा ने साथ न दिया तो—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
उम्र अगर कुछ रंग चुराए,
अनुभव सौ उपहार करे।
तन की गति कुछ धीमी पड़ जाए,
मन फिर भी रफ़्तार भरे॥
साल गिने यह दुनिया चाहे,
सपनों की कुछ उम्र नहीं।
दिल में चाह अभी ज़िंदा है—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
मंज़िल पाकर क्यों रुक जाना,
आगे फिर संसार नया।
एक कहानी पूरी होगी,
जन्मेगा फिर ख़्वाब नया॥
जीत किसी इक मोड़ का किस्सा,
जीवन का यह छोर नहीं।
एक शिखर के आगे भी है—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
हार मिली तो ख़ुद से पूछो,
क्या मुझको बदलाव मिले?
राह पुरानी बंद हुई तो,
शायद बेहतर राह मिले॥
हार किसी इक कोशिश की है,
जीवन की यह हार नहीं।
फिर कोशिश करने वाले को—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
कल की चिंता छोड़ मुसाफ़िर,
आज को अपने नाम तो कर।
जितना सफ़र बचा है तेरा,
हँसकर उसको पार तो कर॥
राह बदल जाए तो बदले,
बदलें अपने उसूल नहीं।
जब तक दिल में ख़्वाब बचा है—
रुकना अभी मंज़ूर नहीं॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X