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राजकुमार से बुद्ध तक

                
                                                         
                            राजकुमार से बुद्ध तक
                                                                 
                            

महलों में हर सुख पाया था,
वैभव ने संसार सजाया था,
राजकुमार सिद्धार्थ के आगे,
सुख का हर भंडार लगाया था।
सब कुछ था, फिर भी मन में,
कितने प्रश्न अनुत्तरित पड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

एक दिवस जब बाहर आए,
वृद्ध पुरुष को सम्मुख पाए,
झुकी कमर और काँपते तन ने,
जीवन के कुछ प्रश्न जगाए।
यौवन जिस पर गर्व करे मन,
एक दिवस उसके रंग झड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

फिर रोगी को तड़पते देखा,
तन को पीड़ा सहते देखा,
जिस काया पर गर्व मनुज को,
उसको पल-पल ढहते देखा।
दुख का कारण जान सकें क्या,
मन में प्रश्न नए आ पड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

फिर अर्थी को जाते देखा,
पीछे अपनों को रोते देखा,
जिस जीवन को अपना कहते,
उसको क्षण में खोते देखा।
मृत्यु खड़ी जब अंत सभी के,
जीवन के क्या अर्थ बड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

फिर संन्यासी शांत दिखा था,
मुख पर अद्भुत तेज खिला था,
कुछ भी पास नहीं था उसके,
फिर भी मन संतुष्ट दिखा था।
महलों में जो शांति न पाई,
उसके संकेत सामने पड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

रात निर्णय बनकर आई,
सोई थी दुनिया सुख पाई,
पत्नी, पुत्र और राजमहल पर,
अंतिम दृष्टि ठहर-सी आई।
एक तरफ़ थे मोह के बंधन,
एक तरफ़ सत्य-पथ खड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

राजसी वस्त्र भी पीछे छोड़े,
सुख के सारे घेरे तोड़े,
वन-वन भटके, तप भी साधा,
तन के सारे आग्रह छोड़े।
तन को कष्ट दिया तो जाना,
उत्तर फिर भी दूर पड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

भोग नहीं, न घोर तपस्या,
दोनों में ही अति को देखा,
दोनों छोरों से हटकर फिर,
मध्यम मार्ग सहज-सा देखा।
संतुलन की राह मिली तो,
कदम उसी पथ पर बढ़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

बोधिवृक्ष की छाँव में बैठे,
अपने भीतर गहरे उतरे,
रात ढली, भ्रम टूटते गए,
मन के सारे अँधेरे बिखरे।
अंतर में जब ज्ञान जगा तो,
सारे भ्रम निष्प्राण पड़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

दुख है—इसको जान लिया था,
उसका कारण पहचान लिया था,
दुख से मुक्ति संभव है फिर,
मुक्ति-पथ भी जान लिया था।
करुणा, प्रज्ञा, मध्यम पथ के,
मानव हित सिद्धांत गढ़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

सिद्धार्थ गए थे सत्य खोजने,
लौटे जग का दुख बाँटने,
अपने भीतर दीप जला तो,
चल पड़े सबकी राह दिखाने।
जिस पथ पर वे स्वयं चले थे,
लाखों पग उस ओर बढ़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥

राजा होते—राज्य चलाते,
कालचक्र में नाम मिटाते,
बुद्ध बने तो युग-युग से वे,
मानव को सत्पथ दिखलाते।
त्याग किया तो सीमित जीवन,
युग-युग के विस्तार चढ़े—
राजपद, राजमहल सब त्याग दिए,
सत्य की खोज में निकल पड़े॥
— संतोष कुमार शर्मा
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14 घंटे पहले

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