मैं कहूं प्रेम दिवस या फिर बलिदान दिवस
जहां प्रेम दिवस पर मातम छा जाता है।
किसी हंसते खेलते जीवन में जैसे कोई
जीवन का अंधकार खुशियां खा जाता है।।
पुलवामा हादसा नहीं हत्या की एक साज़िश थी,
राष्ट्र पुत्रों के प्राण हरने की एक घातक तैयारी थी,
थे नरपिशाच ताक में मंसूबों को अंजाम दे डाला
भारत मां के वीर सपूतों को धोखे से मार डाला।।
हर आंख नम और क्रोध की भड़कती चिंगारी थी,
इन वीर सपूतों हित रोती जनता भारत की सारी थी।
लिया तुरंत निर्णय और सेना को फिर आदेश दिया
पुलवामा का बदला फिर वीरों ने बालाकोट से लिया।।
नंदन अभिनंदन गर्जन करके दुश्मन पर टूट गए,
दुश्मन के देखो फिर घर में ही छक्के छूट गये।
घर में घुसकर बेरहमी से दुश्मन का सत्यानाश किया
भारत मां के वीरों ने वीरता का एक नया इतिहास रचा।।
जब जब पुलवामा का इतिहास कभी दोहराया जायेगा,
तब देखना दुश्मन अपने घर में ही वीरों से मात खायेगा।
पाक के नापाक इरादे जब भारत में विष घोल जाते हैं।
ये नरपिशाच फिर खुद के घर में ही छुप कर फिर रोते हैं।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
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