प्रतीकों में जीवन-सूत्र
शिव के द्वार खड़े हैं नंदी,
दृष्टि उन्हीं पर ठहरी जाए।
धैर्य रहे, विश्वास अडिग हो,
मन लक्ष्य से भटक न पाए॥
शक्ति सदा आवाज़ नहीं है,
मौन भी सामर्थ्य दिखलाए।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
विष्णु संग गरुड़ के पंखों में,
ऊँची दृष्टि का भाव मिले।
धरती से संबंध रहे पर,
सपनों को आकाश मिले॥
ऊँचा उड़ना तभी सार्थक,
जब पाँवों में धरा समाए।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
लक्ष्मी कमल पर जब विराजें,
कीचड़ में भी फूल खिले।
धन-संपदा जितनी भी आए,
मन पर कोई दाग न मिले॥
वैभव का क्या मोल अगर फिर,
मन ही अपना मैला हो जाए।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
सरस्वती के संग में हंस हो,
नीर-क्षीर का भेद बताए।
ज्ञान बहुत मिल जाए जग में,
क्या चुनना है—यह सिखलाए॥
पढ़ लेना ही ज्ञान नहीं है,
विवेक सही पहचान कराए।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
गणपति का मूषक छोटा-सा,
मन की चंचल चाल बताए।
इच्छाएँ दौड़ें दस दिशाओं,
बुद्धि उनको राह दिखाए॥
मन को मारो नहीं, सँवारो,
श्रेष्ठ लक्ष्य में उसे लगाएँ।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
दुर्गा का सिंह दहाड़े लेकिन,
माँ के आगे शीश झुकाए।
साहस हो, सामर्थ्य प्रबल हो,
पर संयम भी साथ निभाए॥
शक्ति वही जो रक्षा करती,
अहंकार में बदल न जाए।
हर प्रतीक यही समझाता—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
बात सवारी भर की कब थी,
हर प्रतीक कुछ राह दिखाए।
अपने भीतर की हर वृत्ति को,
देवत्व सही दिशा दे जाए॥
नंदी-सा विश्वास हो मन में,
हंस-विवेक सही राह दिखाए।
गरुड़-दृष्टि, सिंह-सा साहस,
कमल-सा मन निर्मल हो जाए॥
मूषक-सा चंचल मन अपना,
गणपति की बुद्धि से जुड़ जाए।
मंदिर में ही देव न छूटें—
कुछ देवत्व भीतर जग जाए॥
— संतोष कुमार शर्मा
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