आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रकृति का तांडव

                
                                                         
                            प्रकृति अपने रौद्र रूप में
                                                                 
                            
आकर सब बहा जाती है,
इंसान के सारे सपनों को
एक पल में तोड़ जाती है।

कहाँ माँ है, कहाँ पिता है,
कहाँ भाई है, कहाँ बहन,
प्रकृति के उस तांडव ने
सबको कर दिया जलमग्न।

कल तक जिन आँगनों में
बच्चों की किलकारी गूँजती थी,
आज उन्हीं घरों की चौखट पर
बस खामोशी मिलती है।

जो अपने थे, बिछड़ गए,
जो साथ थे, वो खो गए,
आँखों में आँसू रह गए
और सपने सारे सो गए।

न धन काम आया, न दौलत,
न ऊँची दीवारें बच पाईं,
प्रकृति के आगे पल भर में
इंसान की सारी ताकत हार गई।

इंसान खुद को मालिक समझकर
प्रकृति से खिलवाड़ करता है,
पेड़ों को काट, नदियों को बाँध
अपने ही विनाश को आमंत्रित करता है।

प्रकृति माँ है, जीवनदायिनी,
उसका सम्मान करना सीखो,
धरती के आँचल को मत उजाड़ो,
उसके संग जीना सीखो।

क्योंकि जब प्रकृति मुस्कुराती है,
धरती स्वर्ग बन जाती है,
लेकिन जब वह रौद्र रूप धरती है,
तो पूरी दुनिया हिल जाती है
-नीता श्रीवास्तव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर