ढूँढते हैं हम कला स्वच्छंद को,
पूर्ण कैसे हम करें इस बंद को।
भावनाएँ जब बयाँ होने लगीं,
देखता है क्या कोई फिर छंद को।
गर्व से खिलता है चेहरा फूल का,
ढूँढते हैं जब भ्रमर मकरंद को।
वस्त्र पर जो मुफ़लिसी के छेद हैं,
शर्म से ढंकते हैं उस पैबंद को।
मुफ़लिसों का है न कोई ख़ैर-ख़्वाह,
पूजते हैं लोग दौलतमंद को।
रास्ता मेरा अकेला इसलिए,
पूछता है कौन इस मतिमंद को।
तल्ख़ियों से मन कसैला हो गया,
दिल लगाए जा रहा गुलक़ंद को।
हीनता से सब उसे ही देखते,
शान मिलती क्या कभी जयचंद को।
'अब्र' ही तो चूमती है हर क़दम,
कामयाबी वक़्त के पाबंद को।
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