शाम ढले जब दूर सड़क पर,
एक आहट सी होती थी,
पापा की उस पुरानी साइकिल की,
जब घंटी 'ट्रिन-ट्रिन' बजती थी।
दिनभर की थकान चेहरे पर,
पर होंठों पर एक मुस्कान लिए,
आते ही पूछना—"चलो घूम आएं?"
हाथों में मेरा हाथ लिए।
आगे की उस रॉड पे बैठा,
मैं खुद को राजा समझता था,
पापा के मजबूत हाथों के पहरे में,
हवाओं के संग उड़ता था।
रास्ते में दुकान पर रुककर,
जब टॉफी-चौॉकलेट दिलाते थे,
मेरी एक छोटी सी जिद्द पर,
पापा बच्चे बन जाते थे।
मुस्कुराकर अपने हाथों से,
जब मीठा सा वो स्वाद दिया,
दुनिया की हर खुशी से बढ़कर,
मुझको वो एहसास दिया।
ना जाने कहाँ खो गई वो साइकिल,
ना जाने कहाँ खो गई वो शाम,
पर आज भी दिल के कोने में,
गूंजे वो 'ट्रिन-ट्रिन' का नाम।
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