नियति के खेल भी बड़े निराले होते हैं,
कभी अपने भी अजनबी, कभी अजनबी अपने होते हैं।
हम लाख कोशिशें करें राहें बदलने की,
कुछ फ़ैसले वक़्त के हाथों लिखे होते हैं।
हर मोड़ पर कुछ खोना, कुछ पाना तय नहीं,
कुछ ख़्वाब अधूरे रहकर भी अपने होते हैं।
नियति से भला कौन जीत पाया है,
जिसे मिलना हो, वो बिछड़कर भी मिलता है,
और जिसे बिछड़ना हो,
वो पास रहकर भी कहाँ अपना हो पाता है!
शायद यही नियति है...
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे हैं,
और कुछ अधूरे रहकर भी ज़िंदगी में पूरेहैं...!!
-संजय श्रीवास्तव
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