आग मस्तिष्क में चिंतन विस्तार कर!
सुप्ति में साधना कल्पना के काल कर!!
ध्वस्त रूपरेखाओं पर ना तू मलाल कर! कालखण्ड शेष जो है, शेष पर विचार कर!!
अंबकों को मूंद-मूंद हौसलों के हार कर!
क्षण-क्षण में उन्नति हो प्रकटन समकालकर!!
कर-कर से काज कर, आज कर, आज कर!
स्वप्नों में चेतना हो, नित्य नव विहार कर!!
व्योम कुल तिरी बूझ स्वयं पर भी साख कर!
दीवास्वप्न महिपाल नभ-गमन राज कर!!
राज कर,राज कर, नभ गमन राज कर!!
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