मिट्टी की लकीरों से ओलंपिक तक: 'कित-किट'
आँगन की कच्ची मिट्टी पर, ईंट का एक टुकड़ा लाया,
ज़मीन पर खींच कर खाने, हमने कित-किट खेल बनाया।
वो चिलचिलाती धूप दोपहर की, या ढलती शाम सुहानी,
एक टांग पर उछल-कूद कर, लिखी गाँव की कहानी।
पासा या कंकड़ फेंक के सीधा, जब खाने में गिरता था,
जीत-हार से परे वो पल, मासूम खुशी से भरता था।
गाँव की वो अल्हड़ बेटियाँ, जब बिंदी-पायल संग धाती थीं,
कित-किट के उस हर चौखाने में, नया हौसला पाती थीं।
ना कोई महंगा उपकरण था, ना कोई स्टेडियम खास,
बस एक लकीर, एक नन्हा कंकड़, और था सच्चा विश्वास।
वो संतुलन, वो सटीक निशाना, वो एकाग्रता की रीति,
गाँव के हर एक आँगन में, गूँजती थी जिसकी प्रीति।
आज वक्त आ गया है कि, इस मिट्टी को सम्मान मिले,
हमारी इन सदियों पुरानी, धरोहरों को मुकाम मिले।
जो हुनर दिखा उस मिट्टी पर, वो अब सिंथेटिक ट्रैक पर आए,
हमारा पारंपरिक 'कित-किट', अब राष्ट्रीय खेल बन जाए!
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