मेरा जीवन पता नहीं कौन से रहस्य मय संसार में भटक
रहा है,
हर दिन जीवन में एक नया दृश्य बदल रहा है
जो वर्तमान है,वो कब भूत बन जाता है पता नही चलता
लाख कोशिश के बाद भी जीवन वक्त के हिसाब से क्यों नहीं ढलता
वक्त दिन पर दिन नए जख्म देता है, और पुराने घावों को भरने भी नहीं देता
जमाने से कैसे बांटू अपना दर्द,छिड़क देता है,वो नमक और उफ्फ करने भी नही देता
दिखावे की दुनिया है,
जहां निस्वार्थ अपने पन की आशा करना व्यर्थ है
क्योंकि रिश्तों में दिखावा ही सबसे बड़ा अनर्थ है
नफरत है मुझे दोहरे चरित्र से,
जो सामने कुछ और पीछे कुछ और होते हैं
लेकिन कैसे समझाऊं अपने मन को,की लोग
सामने अपने
और पीछे कटार लेकर घूमते।है,
जो खुद जख्म देते और खुद घावों को सीने का छलावा करते हैं
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