आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैंने उसे अपने दिल के कोने में कुछ यूँ सजा

                
                                                         
                            मैंने उसे अपने दिल के कोने में कुछ यूँ सजा रखा है, जैसे गंगा किनारे बनारस बसा रखा है।
                                                                 
                            
उसकी यादों के दीये बुझने नहीं देता हूँ मैं, अपनी पलकों पे इक छोटा-सा घाट सजा रखा है।
वो मिले या न मिले, ये मुक़द्दर की बात है, मैंने हर दुआ में उसका नाम छुपा रखा है।
उसकी आँखों में देखा था जो सुकून का मंज़र, आज तक दिल ने वही ख़्वाब बचा रखा है।
वो गुज़रता है मेरी सोच की गलियों से अक्सर, जैसे किसी ने बनारस में घर बना रखा है।
न कोई शोर है इसमें, न कोई दावा-ए-मोहब्बत, मैंने ख़ामोशी को ही अपना पता बना रखा है।
लोग कहते हैं कि भूल जाओ उसे अब तुम, मैंने तो उसकी याद को अपना ख़ुदा बना रखा है।
वक़्त की आँधियाँ क्या बिगाड़ेंगी इस रिश्ते का, मैंने मोहब्बत को रूह में कुछ यूँ बसा रखा है।
कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, मगर ख़ूबसूरत इतनी होती हैं कि उम्र भर दिल में बनारस बनकर रहती हैं।
-अतिशा माथुर 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर