क्यूँ छुपाते हो तुम
क्यूँ ख़ामोशी में बात रखते हो तुम,
जो कहना है, क्यूँ नहीं कहते हो तुम।
क्यूँ नज़रों से मुख़बिरी कराते हो तुम,
राज़ रखना है तो नज़रें चुराते क्यों हो।
क्यूँ फ़ासलों की दुहाई देते हो तुम,
फिर मिलने के बहाने बनाते क्यों हो।
क्यूँ हर मुलाक़ात को इत्तिफ़ाक़ कहते हो,
फिर उसी इत्तिफ़ाक़ को दोहराते क्यों हो।
क्यूँ बेरुख़ी का दिखावा करते हो तुम,
मेरी फ़िक्र है तो छुपाते क्यों हो।
क्यूँ मेरी कमियाँ गिनाते हो हर बार,
कुछ अच्छा लगे तो बताते क्यों नहीं।
क्यूँ शिकवे पुराने सँभाले हो अब तक,
रिश्ता नहीं है तो निभाते क्यों हो।
क्यूँ सामने आकर अनजान बनते हो तुम,
मेरे जाते ही फिर मुड़ जाते क्यों हो।
क्यूँ कहते हो अब कोई वास्ता नहीं,
मेरी ख़बर फिर भी मँगाते क्यों हो।
क्यूँ मेरे ज़िक्र पर चुप हो जाते हो तुम,
फिर होंठों पे मुस्कान सजाते क्यों हो।
क्यूँ कहते हो अब याद आते नहीं हम,
पुरानी निशानियाँ बचाते क्यों हो।
क्यूँ कहते हो सब फ़ैसले हो चुके,
एक दर फिर भी खुला रखते क्यों हो।
क्यूँ दुनिया को आधी कहानी सुनाई,
आधी कहानी छुपाते क्यों हो।
क्यूँ इनकार इतना जताते हो तुम,
हर बात में इकरार लाते क्यों हो।
कहते हो—अब कुछ भी बाकी नहीं,
तो ‘कुछ नहीं’ इतना बताते क्यों हो॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X