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क्या पता कल पहचान बनकर लौट आऊँ

                
                                                         
                            अभी संघर्षों की राह पर चला हूँ
                                                                 
                            
क्या पता कल आस बनकर लौट आऊँ
राख में दबकर भी चिंगारी बचाए
धैर्य की हर साँस को संबल बनाए

आज ख़ामोशी से ख़ुद को गढ़ रहा हूँ
कल समय के सम्मुख सिर उठाकर खड़ा हूँ
दीप जलाए रखना तुम अपने आँगन में
क्या पता कल प्रकाश बनकर लौट आऊँ

आज किस्मत की लकीरें रूठी हुई हैं
आज राहें भी धुंध में डूबी हुई हैं
पर मुझे विश्वास है इस रात के बाद
नया सूरज खिलेगा फिर इसी आकाश के साथ

टूटकर भी स्वयं को बिखरने नहीं दिया
आँखों के स्वप्नों को मरने नहीं दिया
आज भले ही अधूरा आकार हूँ
क्या पता कल साकार बनकर लौट आऊं

जो मिला है उसे हँसकर स्वीकार करता हूँ
जो नहीं मिला उसका भी सम्मान करता हूँ
वक्त ने दिए हैं जो घाव राहों में
उनसे ही हुनर भरता हूँ अपनी बाँहों में

आज स्वयं से निरंतर लड़ रहा हूँ
क्या पता कल जीत बनकर लौट आऊँ
प्रेम बाँटो और मन के द्वार खोलो
द्वेष की दीवारों को अब तोड़ डालो

जीवन को सरल और सुंदर होने दो
मन की धरती पर प्रेम को बहने दो
फूल बनकर इस धरा पर खिलना है
दूसरों के जीवन में भी रंग भरना है

आज भले ही अधूरा सा सफर हूँ
क्या पता कल पूर्णता बनकर लौट आऊँ
आज वनवास है तो धैर्य भी रखूँगा
अपने कर्मों का दीप जलाए रखूँगा

राम भी लौटे थे कठिन समय के पार
हर अँधेरी रात के बाद होता है उजियार
मेरी मंजिल ने अभी आवाज दी है दूर से
मेरे सपनों ने पुकारा है मुझे फिर से

आज संघर्षों की राह पर चला हूँ
क्या पता कल पहचान बनकर लौट आऊँ
समय की धारा में अपना कर्म लिख जाऊँ
गिरकर सँभलने की नई सीख दे जाऊँ

मेरी सफलता केवल मेरा मान न हो
मेरे होने से किसी का जीवन सुनसान न हो
अभी यात्रा है शेष और हौसला जवाँ है
मेरे भीतर आज भी एक नया आसमाँ है

मैं लौटूँगा तो केवल नाम बनकर नहीं
लौटूँगा किसी के विश्वास की पहचान बनकर
क्या पता कल सम्मान बनकर लौट आऊँ
क्या पता कल अरमान बनकर लौट आऊँ

अभी संघर्षों की राह पर चला हूँ
क्या पता कल इतिहास बनकर लौट आऊँ..D.T
-देवाशीष तिवारी
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53 मिनट पहले

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