कुछ बातें रह गईं
कुछ बातें थीं—कही नहीं,
कुछ चुप्पियाँ बेवजह नहीं।
जो शब्द अधर तक आ पहुँचे,
उनको भी राह मिली नहीं।
एक बात होंठों तक आई,
फिर मौन में जाकर ठहर गई।
वो सामने से गुज़र गए,
आवाज़ हमारी रह गई।
वो पूछते तो कह भी देते,
दिल में इतना साहस था।
बस कौन पहल करता पहले—
इतना-सा ही संशय था।
कुछ ख़त लिखे—भेजे नहीं,
कुछ नाम लिखे—फिर काट दिए।
जो भाव कभी कहने थे हमें,
वो उम्र ने हमको बाँट दिए।
कुछ प्रश्न अधूरे उनके थे,
कुछ उत्तर मेरे पास रहे।
संवाद जहाँ होना था कभी,
वहाँ मौन के इतिहास रहे।
एक रोज़ मिले अनजान-से,
जैसे पहचान कभी थी नहीं।
दोनों के भीतर सागर थे,
पर एक लहर भी उठी नहीं।
नज़रें मिलीं, फिर झुक भी गईं,
कुछ पल को समय भी ठहर गया।
जो बरसों से कहना था हमें,
वो एक नमस्ते में गुज़र गया।
वो अपने सत्य में ठीक रहे,
हम अपने सत्य में ठीक रहे।
दोषी कोई भी था ही नहीं,
फिर क्यों दोनों दूर रहे?
कुछ दूरी नियति ने लिख दी थी,
कुछ दूरी हमने पाल भी ली।
बस एक गाँठ ही खोलनी थी,
हमने पूरी डोर गँवा दी।
फिर ख़बरें उनकी आती रहीं,
हम हाल सभी से कहते रहे।
जिसका नाम नहीं लेना था,
उसी की बातें करते रहे।
कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं,
जिनका कोई उपचार नहीं।
वे पीड़ा भी कहलाती नहीं,
फिर भी मन उनसे मुक्त नहीं।
अब उनसे कोई गिला नहीं,
ख़ुद से शिकायत बाकी नहीं।
बस एक कसक-सी रहती है—
जो बात हुई, वो बात नहीं।
कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते,
बस उनका स्वर बदलता है।
इंसान कहीं भी चला जाए,
एहसास कहाँ पर मरता है।
अब मिलने की अभिलाषा नहीं,
न फिर संवाद ज़रूरी है।
कुछ रिश्तों का अधूरापन ही,
शायद उनकी पूरी कहानी है।
अब सोचूँ तो लगता है मुझे,
हर बात कहाँ कह पाते हैं।
कुछ भाव ज़ुबाँ तक आते हैं,
कुछ मन में उम्र बिताते हैं।
कुछ शब्द कहे—तो ख़त्म हुए,
कुछ मौन रहे—आबाद रहे।
जो बात कभी हम कह न सके,
हम उम्र उसी की बात रहे॥
— संतोष कुमार शर्मा
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