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दिल से कोई मिलता नहीं।

                
                                                         
                            चेहरे हज़ारों हैं मगर,
                                                                 
                            
अपना कोई मिलता नहीं।
कंधे से कंधे मिलते हैं,
दिल से कोई मिलता नहीं।

पास सभी दिखते हैं मगर,
दिल कोसों दूर ठिकाना है—
भीड़ मिली हर मोड़ मगर,
कैसा ये ज़माना है॥

तस्वीरें हँसती हैं मगर,
आँखों में वीरानी है।
चेहरे पर उत्सव है मगर,
भीतर एक कहानी है।

पल-पल को तस्वीरों में
दुनिया को दिखलाना है—
जीना कम, दिखना ज़्यादा,
कैसा ये ज़माना है॥

संपर्क हज़ारों हैं मगर,
संवाद कहीं मिलता नहीं।
शब्द बहुत हैं होंठों पर,
मन कोई पढ़ पाता नहीं।

लफ़्ज़ों की इस बारिश में
एहसास बचाना है—
कहने वाले लाख मिले,
कैसा ये ज़माना है॥

कमरे बड़े होते गए,
दिल और सिमटते जाते हैं।
सामान बढ़ा है घर-घर में,
सुकून घटता जाता है।

सुविधा के इस मेले में
चैन कहाँ से लाना है—
सब कुछ घर में आ पहुँचा,
कैसा ये ज़माना है॥

माँ राह निहारे आज भी,
बेटा मगर मसरूफ़ बहुत।
बाबूजी कम ही कहते हैं,
आँखें कहती हैं बहुत।

जिन हाथों ने वक़्त दिया,
उनको वक़्त न दे पाना—
उम्र मिली जिन हाथों से,
कैसा ये ज़माना है॥

बच्चे बड़े होते गए,
बचपन पीछे छूट गया।
सपनों का क़द बढ़ता गया,
आँगन छोटा होता गया।

कल की ऊँची उड़ानों में
आज कहीं खो जाना है—
पंख मिले, पर खेल गए,
कैसा ये ज़माना है॥

रिश्ते बहुत बनते हैं मगर,
सब्र कहीं मिल पाता नहीं।
‘मैं’ इतना ऊँचा हो बैठा,
‘हम’ नज़र कहीं आता नहीं।

झुकने में जो प्यार छिपा,
उसको हार बताना है—
‘मैं’ बचता है, ‘हम’ मिटता है,
कैसा ये ज़माना है॥

चाहत वही दिल वाली है,
अंदाज़ बदलते जाते हैं।
दिल आज भी वैसे टूटें,
बस राज़ बदलते जाते हैं।

मिलना जितना आसान हुआ,
निभना उतना मुश्किल है—
दिल अब भी नाज़ुक शीशा,
कैसा ये ज़माना है॥

दौलत बढ़ती जाती है,
हसरत बढ़ती जाती है।
मंज़िल मिलती जाती है,
मंज़िल फिर बदल जाती है।

कल को बेहतर करने में
आज ही रोज़ गँवाना है—
जीने की तैयारी में,
कैसा ये ज़माना है॥

ज्ञान बहुत बढ़ता गया,
बोध कहीं घटता गया।
जग को पढ़ते-पढ़ते मन,
ख़ुद से ही कटता गया।

धरती नापी, नभ छू डाला,
मन फिर भी अनजाना है—
दुनिया सारी पढ़ बैठे,
कैसा ये ज़माना है॥

पूजा के स्वर ऊँचे हैं,
मन में मगर दीवारें हैं।
माथे पर चंदन गहरा,
दिल में कितनी दरारें हैं।

ईश्वर को पाने निकले,
इंसाँ को बिसराना है—
मंदिर पास बहुत आए,
कैसा ये ज़माना है॥

फिर भी दीपक जलते हैं,
फिर भी रिश्ते पलते हैं।
बिन मतलब कुछ हाथ अभी,
गिरते हाथ सँभालते हैं।

दर्द बिना बोले कोई
अब भी अगर पहचान सके—
इंसान अभी ज़िंदा है,
इतना तो माना है॥

घर लौटे कोई थककर,
दरवाज़ा खुल जाता है।
‘खाना लगा दूँ?’ सुनते ही,
मन फिर घर हो जाता है।

चार दीवारें घर कब थीं,
अपनों से घर बनता है—
जिस घर में अपनापन हो,
वो घर ही ख़ज़ाना है॥

दुनिया नई होती रहे,
विज्ञान नया होता रहे।
सपनों का आकाश बढ़े,
इंसान बड़ा होता रहे।

बस इतना-सा ध्यान रहे—
दिल को नहीं गँवाना है।
दौर भले ही नया रहे,
इंसान वही पुराना है॥
— संतोष कुमार शर्मा

 
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6 घंटे पहले

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