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ज्ञान का पहला दिया

                
                                                         
                            विषय ज्ञान का पहला दिया
                                                                 
                            

दुनिया के बढ़ते अंध में अब ज्ञान ज्योति जलानी होगी,
खोती हुई मानवता को संजीवनी बूटी अब पिलानी होगी।
संस्कृति संस्कार का होता पतन संसय पैदा अब करता है,
दिन प्रतिदिन दूषित मानसिकता का प्रभाव अब बढ़ता है।।

ज्ञान का पहला दीप कौन जलाये? क्या कभी विचार किया,
दूषित होते जीवन का कभी क्या किसी ने उपचार किया।
सभ्यता संस्कृति को आगे बढ़कर नई पहचान दिलानी होगी,
कुविचार और कुसंस्कृति की सबको होली अब जलानी होगी।।

मंथन करना होगा अब दीप ज्योति प्रज्ज्वलित करनी होगी,
पहली ज्योति जलाकर फिर जीवन कहानी समझानी होगी।
अपना जीवन अपना पथ खुद स्वयं को ही चुनना पड़ता है,
पथ में बिखरे कांटों को तो स्वयं ही सबको चुनना पड़ता है।।

ज्ञान का पहला दीप मात-पिता मिल ही तो जलाते हैं,
पहले गुरु बनकर वे बच्चों को रिश्ते नाते को समझाते हैं।
उसके बाद विद्यालय में ज्ञान का दीप जलाया जाता है,
कच्ची मिट्टी को फिर आकृति में सहजता से ढाला जाता है।।

यही आकृति बनकर फिर ज्ञान विज्ञान को रोशन करती हैं,
जिसके जैसे स्वप्न होते जीवन की तस्वीर वैसी ही बनती है।
अपने ज्ञान की पहली ज्योति खुद को ही जलानी पड़ती है,
अपने जीवन की गहरी नींव खुद से ही तो खुदवानी पड़ती है।।

गुरु पथ प्रदर्शक बनकर बस मार्ग मनुज को दिखलाता है,
जीवन की हर अच्छाई बुराई का सहजता से परिचय कराता है,
यही ज्ञान दीप जलकर फिर हर जीवन को रोशन करता जाता है,
जिसने जैसा विचार किया जीवन उसी रूप में फिर ढल जाता है।।

-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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