एक प्यारी, छोटी
, नन्ही सी जान,
चेहरा जिसका था सर्द बर्फ सा सफ़ेद,
आँसुओं से भरी थीं वो आँखें उसकी,
पर पलकों तक आने में था गहरा भेद।
छुपाए बैठा था बहुत से दर्द वो अपनी मुस्कान के पीछे,
कंधों पर उठाए हुए फर्ज़ का भारी बोध,
उन नन्हें हाथों की लकीरों में जहाँ लिख दी गई थी,
वो ज़बर-ए-मशक्कत, जिसका न था कोई विरोध।
चलता था ऐसे जैसे वो कर्ज़दार हो किसी का,
बड़ा तकल्लुफ़ था उसे बयाँ करने में अपना दर्द,
जब पूछा मैंने, तो बस हँसकर टाल गया वो,
छुपाकर अपने भीतर जाने कितने मौसम सर्द।
ज़ुबान तो उसकी पूरी तरह ख़ामोश थी वहाँ,
पर चेहरे के ज़ख़्म उसके जैसे चीख़ रहे थे,
बेबस था वो हालातों से या भूख की तड़प थी,
जिसने उसे उम्र से पहले इतने तजुर्बे दिए थे।
हाथों की उस जलन और चेहरे के ज़ख़्मों के साथ भी,
उसे बख़ूबी मालूम था अपना ये हुनर और काम,
कि आने वाले हर एक सैलानी के सामने यहाँ,
चेहरा साफ़ रखना है और दिखानी है फुर्ती सुबह-ओ-शाम।
Jasvinder kaur
बहुत से लोग मशवरा देते हैं...कुछ ही होते है जो रास्ता दिखाते हैं l
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