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                            चले आओ के…
                                                                 
                            
ढूँढने वो जो मेरा मुझमें कुछ खो गया है—वजूद,
हृदय की उस सूनी ज़मीन पर हसरतों के बीज बोने को,
जहाँ आँसुओं की बारिशों से धुल गए सब रंग,
जहाँ मरुस्थल की रेत से तूफ़ान आते हैं, बताए बिन।
रूह पर फैला अकाल,
जिसने सुखा दिए वो फूल सारे ख़्वाहिशों के,
वो उदासियों की परछाइयों से सियाहतर,
वो एक कोना जो सर्द-सा नम हो गया था तेरे बिन।
ख़ामोश चीख़ों की सदा…
और बेबसी का सदा जागते रहना।
चले आओ के…
तेरी आहटों से धड़कनों की रफ़्तार बढ़ जाए,
चले आओ के…
तेरे आग़ाज़ से यादों की आवारगी को राह मिल जाए।
तेरी मुस्कुराहट देख कर जो लौ जले,
भीतर चीर कर सब अँधेरों को,
बुझी हुई को नूर कर जाए।
चले आओ के…
मौसम में ज़रा बदलाव आ जाए,
के दशकों के कहत में
फिर से थोड़े फूल खिल जाएँ।
चले आओ…
के तेरे लौट आने का सबब ये काश हो जाए,
आख़िरी साँस तक तुम साथ हो—
ये बात हो जाए।
अपनी क़ुर्बत की ज़रा-सी आँच दे जाओ,
के उस ताप से
मैं थोड़ा निर्जीव-सी सजीव हो जाऊँ।
चले आओ के तुम…
जस्मीत से मनमीत, फिर हमरूह हो गए,
तुम दूर होकर भी मुझमें कहीं महफ़ूज़ हो गए।
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एक घंटा पहले

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