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दुनिया है घूम ली मगर जन्नत तो है बस अपना घर।

                
                                                         
                            थक गई, मेरी आँखें और रुक गए मेरे पैर
                                                                 
                            
अपने हों, भले साथ में पर लगते थे, सब गैर।

सपनों के पीछे दौड़ते अब थक गया था मन
ढूँढ रही थी मै हर पल,मेरा बीता हुआ बचपन।

चौखट पर कदम रखते ही सुकून आ गया
जैसे बरसों बाद किसी ने बाहों में सुला लिया।

वहीं आंगन वही छत, वहीं घर की दीवार
जैसे बरसों से कर रही हो मेरा इंतजार।

न कोई अजनबी चेहरा, न कोई बनावट
हर कोने को देखकर आ गई मन को राहत।

बाहर की दुनिया की वो चकाचौंध हो गई बेअसर
दुनिया है घूम ली मगर जन्नत तो है बस अपना घर।
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1 hour ago

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