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फिर भी दिल कुछ कह पाया है

                
                                                         
                            दुनिया ने बहुत सताया है
                                                                 
                            
फिर भी दिल कुछ कह पाया है
वैसे ये भी क्या कुछ कम है
जो साथ में हर पल साया है
मैं अपना आप तमाशाई
ख़ुद को जैसे लुटवाया है
तुम मुझे जानते होते तो
कहते जो सालता आया है
जाने क्यों मेरी बातों में
मेरा लहजा घबराया है
मैं सच - सच कहना चाहता हूं
पर झूठ तख़्त पर छाया है
अपने कमरे में रहता हूं
लिखने से जी बहलाया है
इन्सान बने रहने में भी
इन्सान ने शुक्र मनाया है
कुछ 'रंग' न कहना अब अपनी
तन्हाई को भरमाया है
- मृदुल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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