गौशाला : एक लघु ब्रह्मांड
जग के इस अनंत कोलाहल में,
जब मन मेरा थक जाता है,
गौशाला की शांत देहरी पर,
जाने क्यों रुक जाता है।
उस निर्मल-से शांत आँगन में,
हर कोलाहल खो जाता है,
कुछ पल आँखें मूँदूँ तो मन,
स्वयं से मिलने आता है॥
यह युग भले मशीनों का हो,
माटी अब भी अन्न उगाती है,
श्रम, सेवा और सहज समर्पण,
जीने का मर्म सिखाती है।
उस माटी से जुड़ा गौ-जीवन,
मौन में इतना कह जाता है—
जो अपने हित से ऊपर उठकर,
जीता है, वह पूज्य हो जाता है॥
धीरे-धीरे बोध यह होता—
यह केवल गौशाला नहीं,
प्रकृति का जीवंत बसेरा,
केवल कोई चौखट नहीं।
यहाँ मौन भी बोल उठता है,
करुणा गीत सुनाती है,
छोटे-से इस शांत आँगन में,
सारी सृष्टि समाती है॥
गोबर की उस सोंधी गंध में,
माटी का श्रृंगार मिले,
सूखी धरती के आँचल में,
फिर जीवन का संचार मिले।
धरती से जो हमने पाया,
धरती को फिर लौटाना है,
सृष्टि-चक्र का सहज सत्य यह—
लेकर फिर कुछ दे जाना है॥
धवल दूध की निर्मल धारा,
ममता का विस्तार लगे,
घृत की पावन ज्योति जले तो,
जैसे कोई संस्कार जगे।
अपने हिस्से का सब देकर,
जो बदले में कुछ नहीं माँगती,
त्याग, दया और ममता की भाषा,
बिन बोले ही समझाती॥
यहाँ न ऊँचा, यहाँ न नीचा,
न भेदों की कोई दीवार,
एक धरा है, एक ही छाया,
सबको मिलता एक-सा प्यार।
समता का यह सहज सत्य जब,
अंतर्मन में उतर जाता है,
भेद बनाता मनुष्य स्वयं है—
प्रेम सभी को अपनाता है॥
बछड़े की उस भोली आँखों में,
जब नटखट कान्हा दिखते हैं,
उसकी मीठी-सी पुकारों में,
वृंदावन के स्वर मिलते हैं।
लगता है द्वापर गया नहीं,
वह प्रेम जहाँ भी पाता है,
वात्सल्य की निर्मल छाया में,
कान्हा फिर मुस्काता है॥
आस्था कहती—गौ के भीतर,
देवों का भी वास रहा,
भारत की इस पुण्य धरा पर,
उसका अनुपम स्थान रहा।
पर श्रद्धा का मर्म यही है—
जीवन का सम्मान रहे,
जो निर्बल है, जो मूक खड़ा है,
उस पर भी कुछ ध्यान रहे॥
सभ्यताएँ बदलती जातीं,
युग आते हैं, जाते हैं,
जीवन के साधन बदलें लेकिन,
मूल्य कहाँ बदल पाते हैं।
सेवा, करुणा, त्याग, समर्पण,
कल भी थे, कल भी होंगे,
जिन हृदयों में ये दीप जलेंगे,
वे हर युग में उजले होंगे॥
जब-जब मानव स्वार्थ में डूबे,
मन अपनों से कट जाता है,
प्रकृति से जब नाता टूटे,
भीतर कुछ मर जाता है।
सेवा की शीतल छाया में,
मन फिर राह नई पाता है,
दूसरों के हित में जीकर ही,
मानव खुद को पाता है॥
विदा की उस शांत घड़ी में,
हाथ भले ही खाली हों,
मन में लेकिन तृप्ति भरी हो,
आँखें श्रद्धा वाली हों।
तब समझूँ—गौशाला केवल,
चार दीवारों का स्थान नहीं,
सेवा, करुणा और समता से,
बढ़कर कोई विधान नहीं॥
विदा की उस शांत घड़ी में,
मन मेरा भर-भर आता है,
जिसे देखने आया था बाहर,
वह सत्य भीतर मिल जाता है।
तब समझूँ—यह गौशाला केवल,
गौ-सेवा का स्थान नहीं,
यह करुणा का जीवित मंदिर,
मानवता का मान यहीं।
जहाँ मूक की पीड़ा समझी जाए,
जहाँ सेवा सम्मान बने,
जहाँ प्रेम स्वयं पूजा हो जाए,
हर प्राणी भगवान बने।
तब न मंदिर दूर कहीं है,
न ईश्वर का ठिकाना है—
जिस हृदय में करुणा जीवित हो,
वहीं सृष्टि का लघु ब्रह्मांड बसाना है॥
— संतोष कुमार शर्मा
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