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*एक अच्छे इंसान से प्रश्न कि तुम कौन हो? और उसका जवाब —

                
                                                         
                            मैं विनय की माला, या फिर धरती से फटती हुई एक ज्वाला।
                                                                 
                            
मैं दर्द हूँ; उस दर्द से उत्पन्न हुआ एक प्रेम हूँ।
मैं भेंट हूँ उनके लिए, जिनको मैंने अपने हृदय से जोड़ रखा है।
मैं विचारों से बहती हुई एक तेज प्रवाहित नदी हूँ,
जिसको पार करने के लिए मैंने नैतिकताओं से भरी हुई नावों का प्रबंध कर के रखा है।

मैं वो हूँ, जिसको मुश्किलों ने तोड़ कर किसी और पथ के लिए वापिस जोड़ा है।
मैं पापी हूँ — जिसने जाने-अनजाने में लोगों को दुःख दिया है; एक ऐसा अपराधी हूँ मैं।
मैं आशीर्वाद हूँ — जो गलत को गलत कह सके; कुछ ऐसा परिवादी भी हूँ मैं।
मैं आरंभ हूँ, लेकिन कभी भी न खत्म होने वाला; मैं अंत भी हूँ।
मैं घाव हूँ, लेकिन उस घाव के बाद लगने वाला एक मरहम भी हूँ।

मैं वेग हूँ, तेज हूँ, विवेक हूँ; ब्रह्मांड की शक्तियों से मिल के बनने वाला त्रिनेत्र हूँ।
मैं दया हूँ — जिसको हो रहा हो दर्द, उसके लिए एक करुणा हूँ।
मैं निर्दयी हूँ — उस दर्द को उत्पन्न करने वालों के लिए एक रहस्यमयी विस्फोटक हथियार हूँ।

मैं कविताओं से उभरा हुआ एक रस हूँ,
जिसकी व्याख्या से निकला हुआ ‘कल’ हूँ।
मैं एक कोठरी हूँ — दर्द को बाँटने के लिए;
लेकिन उस कोठरी का कोना भी नहीं, जिन्होंने उस दर्द को जन्माया है।

मैं एक कमियों से भरी हुई दुकान हूँ,
जिसके लिए जीने का वही सहारा है।
मेरे अंदर संघर्षों से जूझती हुई एक आत्मा है,
जो कि लोगों के लिए एक बेहतर किनारा है।

मैं एक भूल हूँ उनके लिए, जिन्होंने मेरे इस आज को जन्माया है।
जो प्रशांत को भी शांत कर दे, वैसी मेरे अंदर एक विशाल माया है।
जो हर दर्द से होकर और भी मजबूती से निकल सके, कुछ ऐसी मेरी मोटी काया है।
जो तेज धूप में आराम दे, कुछ ऐसी मेरी शीतल छाया है।

मैं धैर्य हूँ — सब कुछ शांति से देखता हुआ, कल्कि का प्रतीकात्मक अवतार हूँ।
मैं रोता हुआ क्रंदन हूँ; भावनाओं के बीच से निकला एक मधुवन हूँ।

मैं वो हूँ, जिसको आकस्मिक बाधाओं ने रौंदा है।
मैं वो भी हूँ, जिसने उन बाधाओं को बाँध कर विजय-पथ के लिए
वापिस अपने आपको और भी मजबूती से जोड़ा है।

मैं आकाश हूँ और मैं ही पाताल हूँ;
इन दोनों के बीच में उड़ने की कोशिश करता हुआ एक नभचर हूँ।

और आखिर में बस इतना कहना है कि —
मैं एक लघु-उत्तरीय प्रश्न हूँ,
जिसका उत्तर कुछ शब्दों में न दिया जा सके;
ऐसा दीर्घ-उत्तरीय जवाब हूँ।**
- अन्नपूर्णा मिश्रा
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8 घंटे पहले

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