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दीमक भ्रष्टाचार

                
                                                         
                            फाइल चलती नहीं साहब,
                                                                 
                            
जब तक जेब ना गर्म करो।
कलम बिकती है यहां नीलाम में,
ईमान की हर शर्त पे सौदा करो।

अस्पताल में बिस्तर नहीं,
पर मंत्री जी का बंगला चमक रहा।
स्कूल में छत टपकती है,
और ठेकेदार का महल महक रहा।

रिश्वत को "चाय-पानी" कहते हैं,
घूस को "सेवा-शुल्क" नाम देते हैं।
जिस कुर्सी पे बैठे हैं जनता के लिए,
उसी कुर्सी का किराया मांग लेते हैं।

एक सड़क बनती है कागज़ पर,
तीन बार उद्घाटन होता है।
बारिश आते ही बह जाती है,
फिर नया टेंडर पास होता है।

किसान का कर्ज माफ नहीं होता,
पर घोटालेबाज माफ हो जाता है।
चपरासी जेल में सड़ता है,
अफसर विदेश भाग जाता है।

हम Tax भरते हैं खून-पसीने से,
वो Swiss Bank भरते हैं हमारे पैसे से।
हम लाइन में लगते हैं राशन को,
वो लाइन लगाते हैं कमीशन को।

अब बस बहुत हुआ ये खेल,
दीमक की तरह खा गए देश।
कुर्सी नहीं, कानून बदलो,
वरना जनता खुद करेगी फैसला पेल।

नहीं चाहिए हमें लाचार सिस्टम,
जहां ईमानदार भूखा सोए।
हम कलम से इंकलाब लाएंगे,
और हर भ्रष्ट की कुर्सी रोए।

क्योंकि जब आवाम जागती है,
तो तख्त-ओ-ताज हिल जाते हैं।
और जब युवा कलम उठाता है,
तो बड़े-बड़े गिर जाते हैं।__

 
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2 महीने पहले

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