ख़ुद को पढ़ता हूँ और छोड़ देता हूँ
हर रोज एक नया पन्ना मोड़ देता हूँ
रोज मिलते हैं जख्म इस दुनियां में,
आँखें मलता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।
कैसे देखूं अपनों की बेरुखियां,
क्या करूं बात अधूरी छोड़ देता हूं।
जब खुद का किरदार देखता हूं दर्पण में,
तो घर का वह दर्पण तोड़ देता हूं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X