दर्द छुपाएँ कैसे
दिल की वीरानी छुपाएँ कैसे,
तेरी यादों को भुलाएँ कैसे।
तेरी ख़ुशियों को चुना था हमने,
अपनी क़ुर्बानी बताएँ कैसे।
तेरे हिस्से में उजाला रखकर,
अपने घर के चराग़ जलाएँ कैसे।
तेरी नींदों के लिए जागे थे,
अपनी रातों को सुलाएँ कैसे।
रूह अब तक तेरे दर पर ठहरी,
जिस्म को घर में बुलाएँ कैसे।
हमने आवाज़ भी दी थी तुझको,
अपनी ख़ामोशी सुनाएँ कैसे।
अश्क पलकों पे ठहर जाते हैं,
तेरी तस्वीर बचाएँ कैसे।
इश्क़ रूहों का सफ़र था अपना,
सिर्फ़ रस्मों को निभाएँ कैसे।
तेरी राहों में बिछे थे हम भी,
अपने टुकड़े अब उठाएँ कैसे।
कर्ज़ तेरी दुआओं का बाकी,
अपनी साँसों से चुकाएँ कैसे।
तू मिला भी तो पराया बनकर,
फिर किसी को हम अपनाएँ कैसे।
तेरी ख़ातिर ही जले उम्र भर,
राख अपनी अब उड़ाएँ कैसे।
तेरा आख़िरी ख़त बाकी है,
सीने से उसको हटाएँ कैसे।
“संतोष” रूह में तू शामिल है,
नाम होंठों पे न लाएँ कैसे।
— संतोष कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X