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दाऊ की अपनी बात रही

                
                                                         
                            दाऊ की अपनी बात रही
                                                                 
                            

रोहिणी के आँगन आए,
बल के अनुपम दीप जलाए,
कृष्ण जहाँ थे चंचल कान्हा,
दाऊ बनकर साथ निभाए।
एक बने संसार के नायक,
एक बड़े की छाँह साथ रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

गोकुल की गलियों में खेले,
सुख-दुख दोनों मिलकर झेले,
कान्हा की हर बाल-शरारत,
दाऊ ने मुस्काकर झेली।
कृष्ण जहाँ भी आगे बढ़ते,
दाऊ की छाया साथ रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

हलधर उनका नाम हुआ था,
धरती से सम्मान जुड़ा था,
हल था श्रम का गौरव उनका,
कृषि से जीवन-ज्ञान जुड़ा था।
बल के संग श्रम की महिमा,
धरती की सौगात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

बल था लेकिन मद नहीं था,
शौर्य कभी उन्माद नहीं था,
शस्त्र उठाना जानते थे,
युद्ध मगर संवाद नहीं था।
शक्ति जहाँ संयम में रहती,
वहीं विजय की बात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

भीम और दुर्योधन दोनों,
गदा-युद्ध के शिष्य थे दोनों,
गुरु के सम्मुख भेद न कोई,
वीर उन्हें प्रिय थे दोनों।
गुरु की दृष्टि दोनों पर ही,
निष्पक्षता ही साथ रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

कृष्ण पांडवों के संग आए,
धर्म-युद्ध के सूत्र बनाए,
दाऊ ने पर शस्त्र न साधा,
तीर्थ-पथ पर कदम बढ़ाए।
राह भले दो अलग हुई थीं,
भाई की परवाह साथ रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

यही बंधुत्व हमें सिखाता,
मतभेदों से प्रेम न जाता,
राह अलग हो सकती अपनी,
रिश्ता फिर भी कम न हो पाता।
मत अपना था, पथ अपना था,
मन में प्रेम-सौगात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

अंतिम रण जब सामने आया,
भीम-दुर्योधन ने बल दिखलाया,
अपने दोनों शिष्यों को तब,
गुरु ने रण में भिड़ते पाया।
जिस विद्या पर गर्व कभी था,
आज वही आघात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

भीम नियम की सीमा भूले,
जंघा पर जब प्रहार कर बैठे,
गुरु का क्रोध प्रचंड हुआ तब,
हल लेकर वे आगे बढ़ बैठे।
कृष्ण जहाँ परिणाम समझते,
दाऊ को मर्यादा ज्ञात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

कृष्ण धर्म का मर्म सँभालें,
दाऊ नियम का मान सँभालें,
एक समय की गाँठें खोलें,
एक मर्यादा थामे रहें।
राह अलग थी दोनों की पर,
धर्म की ही बुनियाद रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

पुरी धाम में आज भी देखो,
भाई-बहन का प्रेम भी देखो,
जगन्नाथ के संग सुभद्रा,
बलभद्र की गरिमा भी देखो।
रत्नसिंहासन पर तीनों की,
युग-युग से वह साथ रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

कृष्ण अगर थे नीति के ज्ञाता,
दाऊ शक्ति, श्रम के उद्गाता,
एक जगत को दिशा दिखाते,
एक बने संबल के दाता।
कृष्ण-कथा के हर मोड़ तले,
दाऊ की भी छाप रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥

इतिहासों में नाम जो कम हो,
इससे कब सम्मान भी कम हो,
जो स्वयं नेपथ्य में रहकर,
नायक का आधार बना हो।
कान्हा जग के नायक ठहरे,
दाऊ की सौगात रही—
कान्हा की लीला साथ रही,
दाऊ की अपनी बात रही॥
— संतोष कुमार शर्मा

 
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6 घंटे पहले

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