शहरों की इस चकाचौंध में,
अंधेरा और भी गहरा हो गया है,
महानगरों की ऊँची मीनारों तले,
इंसान जैसे कहीं खो गया है।
स्क्रीन की उस नीली चमक में,
आँखों का सपना अब धुंधला है,
हर हाथ में दुनिया सिमटी है,
पर मन का आँगन बिल्कुल खाली है।
भीड़ दौड़ती है बेतहाशा यहाँ,
पर कोई किसी तक पहुँच नहीं पाता,
हज़ार चेहरों के इस मेले में,
कोई अपना सा नज़र नहीं आता।
हर शख्स अपने ही भीतर कैद है,
दीवारें संवेगों की उठती जाती हैं,
बाहर सब बिखरता रहता है,
और भीतर तन्हाइयाँ बढ़ती जाती हैं।
रिश्ते अब संदेशों में सिमट गए,
संवादों का वो पुराना दौर बीत गया,
भावनाएँ “टाइपिंग…” में ही अटक गईं,
दिलों का मिलना जैसे महज़ रीत गया।
मुस्कान भी अब तो एक 'फ़िल्टर' है,
जो चेहरे पर पल भर को टिकती है,
सच्ची खुशी अब दुर्लभ हो चली,
दिखावे की दुनिया बाज़ार में बिकती है।
कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं,
पेड़ कटते हैं, हरियाली घटती है,
धरती की साँसें अब उखड़ने लगीं,
धुएँ के गुबार में ज़िन्दगी बँटती है।
हम 'विकास' की इस अंधी दौड़ में,
अपनी जड़ों का अर्थ भूलते जा रहे हैं,
मशीनों की होड़ में शामिल होकर,
खुद को ही रोज़ पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
फिर भी उम्मीद का एक कोना शेष है,
जहाँ ज़िंदगी अब भी साँस लेती है,
जहाँ कोई बच्चा मिट्टी में सराबोर,
आसमान को फिर से नया नाम देता है।
कहीं कोई हाथ निस्वार्थ भाव से,
दूसरे गिरते हाथ को थाम लेता है,
बिखरते हुए इस कठिन समय में भी,
इंसान, इंसान होने का प्रमाण देता है।
शायद यहीं से शुरू होगी 'भुवन',
एक नई और मुकम्मल सुबह की कहानी,
जहाँ मशीनों के शोर के बीच भी,
दिल अपनी धड़कन पहचान लेगा पुरानी।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित
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