बारह ज्योति — एक ही शिव
ज्योति जली जब शिव के नाम की,
मन ने अपना द्वार सजाया।
बारह धामों की इस यात्रा ने,
जीवन का हर मर्म बताया॥
सोमनाथ, प्रभास पाटन में,
गिरकर उठने की ठानी।
टूटे कितनी बार समय से,
फिर भी अडिग रही कहानी॥
श्रीशैलम के मल्लिकार्जुन,
शिव-शक्ति का मेल सिखाएँ।
साथ वही जो सुख-दुःख दोनों,
एक भाव से साथ निभाएँ॥
उज्जैन के श्री महाकाल से,
काल भी अपना शीश झुकाए।
आज मिला है, आज सँवारो,
कल का भय क्यों मन में आए॥
ओंकारेश्वर, नर्मदा तट पर,
‘ॐ’ का नाद हृदय में लाए।
बाहर चाहे शोर बहुत हो,
मन अपना फिर केंद्र बनाए॥
केदारनाथ हिमालय बोले,
ऊँची राह कठिन हो जाए।
श्रद्धा संग पुरुषार्थ चले तो,
पाँव स्वयं मंज़िल तक जाए॥
भीमाशंकर, पुणे अंचल में,
वन का मौन हमें समझाए।
प्रकृति से जो नाता रखता,
अपनी जड़ से जुड़ता जाए॥
काशी के श्री विश्वनाथ में,
गंगा जीवन-गीत सुनाए।
आना-जाना सत्य जगत का,
जो आया है, लौट भी जाए॥
त्र्यंबकेश्वर, नाशिक धरती,
गोदावरी की धार बहाए।
बूँद स्वयं से आगे बढ़कर,
कितनों की फिर प्यास बुझाए॥
देवघर के वैद्यनाथ कहें—
पीड़ा से मत हार मानो।
तन हो, मन हो, घाव कहीं हो,
धैर्य को उपचार भी जानो॥
द्वारका के नागेश्वर से,
निर्भयता का भाव जगाएँ।
मन के भीतर भय का विष हो,
शिव-स्मरण से साहस पाएँ॥
रामेश्वरम् सागर-तट पर,
राम स्वयं भी शीश झुकाएँ।
सामर्थ्य कितना भी हो अपना,
विनय हमें ऊँचा ले जाए॥
एलोरा के घृष्णेश्वर में,
भक्ति का सच्चा मर्म समाया।
आकारों से ईश्वर कब बँधे—
भाव ने ही शिव को पाया॥
सोमनाथ से धैर्य मिला तो,
केदार ने पुरुषार्थ सिखाया।
महाकाल ने समय समझाया,
रामेश्वर ने शीश झुकाया॥
बारह धामों तक जाना केवल,
मीलों की कोई यात्रा नहीं।
मन में यदि परिवर्तन न उतरे,
तीर्थयात्रा फिर पूरी नहीं॥
बारह ज्योति देखने निकले,
बारह सीखें साथ में लाएँ।
पत्थर में शिव खोजते-खोजते,
एक दिवस ख़ुद में मिल जाएँ॥
मंदिर तक जो पाँव ले जाएँ,
वह तो बाहर की यात्रा है।
मन के भीतर शिव जग जाएँ—
वही पूर्ण तीर्थयात्रा है॥
नाम अलग हैं, धाम अलग हैं,
ज्योति ने एक सत्य बताया।
शिव को बाहर पूज लिया अब,
भीतर भी शिवत्व जगाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
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