आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उसी दिन सच्चे अर्थों में इंसान बन जाएगा।

                
                                                         
                            आत्मबोध का अभाव
                                                                 
                            
लोग कुछ भी, कभी भी खाते जा रहे हैं,
कब क्या खाना है, कैसे खाना है,
यह तक समझ नहीं पा रहे हैं।
हर छोटे-बड़े काम से घबरा रहे हैं,
हर कदम पर दूसरों से उम्मीद लगा रहे हैं।
किसी से कुछ पूछने में शर्माते हैं,
और अनजाने में दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।
लोग कुछ भी, कहीं भी बोलते जा रहे हैं,
कहाँ क्या बोलना है, यह भूलते जा रहे हैं।
शब्दों की मर्यादा को समझ नहीं पा रहे हैं,
अपनी ही वाणी से अपनी पहचान मिटा रहे हैं।
इस दौर में खुद को जानवर बना रहे हैं,
इंसान होकर भी इंसानियत भुला रहे हैं।
न विवेक पहचान पा रहे हैं, न अपनी क्षमता जान पा रहे हैं,
क्योंकि स्वयं को पहचानने से ही कतरा रहे हैं।
आखिर कब जागेगा इंसान अपने भीतर?
कब समझेगा सही-गलत का अंतर?
जिस दिन स्वयं की क्षमता पहचान लेगा,
उसी दिन सच्चे अर्थों में इंसान बन जाएगा।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर