आत्मबोध का अभाव
लोग कुछ भी, कभी भी खाते जा रहे हैं,
कब क्या खाना है, कैसे खाना है,
यह तक समझ नहीं पा रहे हैं।
हर छोटे-बड़े काम से घबरा रहे हैं,
हर कदम पर दूसरों से उम्मीद लगा रहे हैं।
किसी से कुछ पूछने में शर्माते हैं,
और अनजाने में दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।
लोग कुछ भी, कहीं भी बोलते जा रहे हैं,
कहाँ क्या बोलना है, यह भूलते जा रहे हैं।
शब्दों की मर्यादा को समझ नहीं पा रहे हैं,
अपनी ही वाणी से अपनी पहचान मिटा रहे हैं।
इस दौर में खुद को जानवर बना रहे हैं,
इंसान होकर भी इंसानियत भुला रहे हैं।
न विवेक पहचान पा रहे हैं, न अपनी क्षमता जान पा रहे हैं,
क्योंकि स्वयं को पहचानने से ही कतरा रहे हैं।
आखिर कब जागेगा इंसान अपने भीतर?
कब समझेगा सही-गलत का अंतर?
जिस दिन स्वयं की क्षमता पहचान लेगा,
उसी दिन सच्चे अर्थों में इंसान बन जाएगा।
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