शाम का समय है, बैठा मैं बगीचे में,
सूरज की लाल आँखें, अलसाई-सी हवा बगीचे में।
एक सुकून-सा लग रहा है,
पत्ते भी बातें कर रहे हैं मुझसे।
जैसे कह रहे हों धीरे से,
कुछ पल ठहर जा, क्या रखा है भागने में।
हवाएँ भी धीमी-धीमी हो गईं,
सुकून बढ़ता जा रहा है।
सूरज ढलता जा रहा है,
बगीचा मुझे रोके रखे है।
अमरूद के सफेद फूल,
शांति का एक मंज़र,
सूरज की आँखें—क्रांति का प्रतीक,
हरा-भरा मौसम, मन के भीतर ठहरता सुकून।
ढलता सूरज भी अपना तेज़ बचाए बैठा है,
जैसे कोई उम्मीद अपनी आँखों में सजाए बैठा है।
धीरे-धीरे रात उतर आई,
हवाएँ रुक गईं, पत्ते शांत हो गए,
जैसे इनका महबूब खो गया हो।
मैं भी चुपचाप बैठा रहा उनके करीब,
उस खामोशी को महसूस करता रहा।
अँधेरी रात में सफेद फूल चमक रहे थे,
जैसे अँधेरे में भी उम्मीद जगा रहे थे।
रात चाहे कितनी भी गहरी हो,
सुबह का आना बाकी है।
अमरूद का बगीचा फिर मुस्कुराएगा,
नई धूप का आना बाकी है।
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