ऐ ज़िंदगी, अब तू ही बता (ग़ज़ल)
हर ख़ुशी छीनी तूने, ऐ ज़िंदगी,
अब तू ही बता, तुझे अपनाएँ कैसे।
चैन दो पल का माँगा था तुझसे,
उम्र भर का ये ग़म उठाएँ कैसे।
होंठ हँसते रहे ज़माने में,
अश्क पलकों तले छुपाएँ कैसे।
छाँव माँगी तो धूप ही बरसी,
जलते दामन को अब बचाएँ कैसे।
नाव साहिल पे आके टूट गई,
अब भँवर से निकल के जाएँ कैसे।
फूल राहों में जिनकी रखे थे,
उनके पत्थर भी हम भुलाएँ कैसे।
घर सजाया था जिनकी ख़ातिर,
वो ही बिखरे तो घर सजाएँ कैसे।
रोटी से भूख मिट गई लेकिन,
दिल की वीरानी हम मिटाएँ कैसे।
सच कहा तो गुनाहगार हुए,
झूठ से हाथ हम मिलाएँ कैसे।
प्यार माँगा तो फ़ासले और मिले,
दिल को झूठी-सी आस दिलाएँ कैसे।
ख़त जलाए तो याद और जगी,
दिल से उसका निशाँ मिटाएँ कैसे।
ज़ख़्म ग़ैरों ने दिए होते तो,
अपनों के वार हम भुलाएँ कैसे।
वक़्त को मरहम समझ लिया था,
ज़ख़्म गहरे हुए—घटाएँ कैसे।
मंज़िलें सामने खड़ी हैं मगर,
पाँव ज़ख़्मी—क़दम बढ़ाएँ कैसे।
दर खुला है, मगर न माँ की सदा,
उसके बिन घर में लौट जाएँ कैसे।
तस्वीर उसकी मुस्कुराती है,
भीगी आँखें उसे दिखाएँ कैसे।
हर दुआ उलटवार करती रही,
हाथ सजदे में फिर उठाएँ कैसे।
साँस चलती रही, मगर हमसे,
ज़िंदगी रूठी—उसे मनाएँ कैसे।
“संतोष” तुझसे शिकायतें हैं बहुत,
फिर भी तुझसे जुदा हो जाएँ कैसे।
— संतोष कुमार शर्मा
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