जी! गुज़रा हुआ वक़्त लौटता है,
किसी भीगी हुई शाम के साथ,
इलाइची वाली
एक कप चाय की महक में,
बारिश की बूंदों में लिपटा
उसी इत्र की ख़ुश्बू में,
उस ख़ास राह-गुज़र पर
सूखे गुलाब की सिलवटों में|
कौन कहता है कि
वक़्त लौटता नहीं,
ये लौटता ज़रूर है...
हमारे पास, हमारे लिए,
इक हल्की सी याद बुन
इक ख़ुशनुमा मौसम सजा,
इक पूरा ज़माना लेकर ...!
- उरूज
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