उसके हाथों की पकड़
ऐसी थी जो-
बयान हो ना सके
वो समझंते है
गये कब के छुड़ा
हाथ हमसे
सच तो- यह है
हम आज भी
सिमटे हैं वही
तेरे हाथों में निशां
आज भी मेरे है वही
देख आईनें में जरा
खुद को
कहाँ दिखते नही-
मेरे निशां तुम को।
-ऊर्मि शर्मा
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