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खामोशी में विदाई के दर्द बहुत चुभते है।

                
                                                         
                            खामोशी में विदाई के दर्द बहुत चुभते है।
                                                                 
                            
तब जिस्म को कफन के लिबास फबते है।।

सजा दो डोली विदाई का मुहूर्त आया है।
न रोको इसे अब बंधन बेहिसाब चुभते है।।

विदाई की रीति न जाने कब से चली आई।
श्मशान मेरी मंजिल है आत्मसात चुभते है।।

कंधों पर उठा लो मेरे पाँव बोझिल हो गए।
अश्क न बहाना 'उपदेश' जज्बात चुभते है।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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25 मिनट पहले

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