आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पलके झलकती आँख को आराम मिलता।

                
                                                         
                            सब की दो धडकनों के बीच में गैप् होता।
                                                                 
                            
एक धड़कन जाती दुसरी का आना होता।।

अगली धड़कन की उम्मीद की तरह तुम हो
तुम्हारे नाम के शोर में, मैं डूब जाना होता।।

पलके झलकती आँख को आराम मिलता।
इस सिलसिले में ख्याल को सजाना होता।।

साँस निरंतर चलती रहती अन्दर से बाहर।
और बाहर से अन्दर 'उपदेश' रवाना होता।।

इंतजार रहता लौटने का वो तुम हाँ तुम हो।
और यहाँ तुम्हारी स्मृतियों का ख़ज़ाना होता।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर